पाठ्यक्रम: GS2/राजव्यवस्था और शासन
संदर्भ
- ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ पर संयुक्त संसदीय समिति (JPC) ने कहा है कि समकालिक चुनावों से लगभग 7 लाख करोड़ रुपये की बचत हो सकती है, शासन की दक्षता में सुधार होगा और भारत की GDP वृद्धि दर में 1.6% तक की वृद्धि हो सकती है।
पृष्ठभूमि
- समकालिक चुनावों को लागू करने के लिए वर्ष 2024 में लोकसभा में संविधान (एक सौ उनतीसवाँ संशोधन) विधेयक, 2024 तथा संघ शासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक, 2024 प्रस्तुत किए गए।
- इन विधेयकों में लोकसभा और विधानसभा चुनावों को एक साथ कराने का प्रावधान है, जिसके अंतर्गत किसी विशेष लोकसभा के बाद चुनी गई राज्य विधानसभाओं का कार्यकाल उसी लोकसभा के कार्यकाल के साथ समाप्त होगा।
- एक बार विधानमंडलों के कार्यकाल समन्वित हो जाने पर आगामी आम चुनाव एक साथ आयोजित किया जाएगा।
- ये विधेयक संयुक्त संसदीय समिति को भेजे गए हैं, किंतु समिति ने अभी अपनी सिफारिशें साझा नहीं की हैं।
विधेयकों की मुख्य विशेषताएँ
- उत्तरदायी संस्थाएँ: संविधान (129वाँ संशोधन) विधेयक, 2024 निर्वाचन आयोग को लोकसभा और सभी राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने का अधिकार देता है।
- संघ शासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक, 2024 इस ढाँचे को संघ शासित प्रदेश विधानसभाओं तक विस्तारित करता है।
- समकालिक चुनावों का प्रारंभ: अधिसूचना की तिथि के बाद गठित सभी राज्य और संघ शासित प्रदेश विधानसभाओं का कार्यकाल लोकसभा के पूर्ण कार्यकाल के साथ समाप्त होगा। इसके बाद लोकसभा और सभी राज्य तथा संघ शासित प्रदेश विधानसभाओं के चुनाव एक साथ होंगे।
- लोकसभा या विधानसभा का पूर्ववर्ती विघटन: यदि लोकसभा या कोई राज्य/संघ शासित प्रदेश विधानसभा पाँच वर्ष के पूर्ण कार्यकाल से पहले भंग हो जाती है, तो शेष कार्यकाल के लिए चुनाव कराए जाएँगे।
- इससे प्रत्येक पाँच वर्ष में चुनावों का समन्वय होगा।
- राज्य चुनाव स्थगित करना: यदि निर्वाचन आयोग का मत है कि किसी विशेष राज्य विधानसभा का चुनाव समकालिक चुनावों के साथ नहीं कराया जा सकता, तो वह राष्ट्रपति को सिफारिश कर सकता है।
- तत्पश्चात राष्ट्रपति आदेश जारी कर उस राज्य विधानसभा का चुनाव बाद में कराने का निर्देश दे सकते हैं।
- संघ शासित प्रदेश कानून संशोधन विधेयक में ऐसा प्रावधान नहीं है।
समकालिक चुनाव क्या हैं?
- समकालिक चुनाव (वन नेशन वन इलेक्शन) का आशय लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने से है, ताकि चुनावों की बारंबारता एवं उनसे जुड़ी लागत को कम किया जा सके।
- भारत में लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के समकालिक चुनाव 1951-52, 1957, 1962 और 1967 में कराए गए थे। इसके बाद यह समय-सारणी बनाए नहीं रखी जा सकी और अब तक चुनावों का पुनः समन्वय नहीं हो पाया है।
‘वन नेशन वन इलेक्शन’ के पक्ष में तर्क
- व्यय में कमी: अलग-अलग चुनाव कराने में होने वाले भारी व्यय को कम किया जा सकेगा।
- प्रक्रिया का सरलीकरण: एक ही चुनाव चक्र का प्रबंधन कई अलग-अलग चुनावों की तुलना में सरल होगा और प्रशासनिक संसाधनों का कुशल उपयोग होगा।
- शासन पर प्रभाव: बार-बार चुनावों के कारण आचार संहिता लंबे समय तक लागू रहती है जिससे शासन प्रभावित होता है। समकालिक चुनाव इस समस्या को दूर कर सकते हैं।
- शासन पर ध्यान: लगातार चुनावी मोड में रहने के बजाय शासन पर ध्यान केंद्रित होगा।
- प्रत्यक्ष जवाबदेही: मतदाता एक ही समय पर केंद्र और राज्य सरकारों की जवाबदेही तय कर सकेंगे।
- सहकारी संघवाद को सुदृढ़ता: समन्वित चुनावी कैलेंडर संघ और राज्यों के बीच नीति स्थिरता एवं सहयोग को बढ़ावा देगा।
‘वन नेशन वन इलेक्शन’ के विरुद्ध तर्क
- लॉजिस्टिक चुनौतियाँ: राज्यों और केंद्र सरकार को विशाल लॉजिस्टिक चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा।
- स्थानीय प्राथमिकताएँ: राष्ट्रीय मुद्दों के कारण क्षेत्रीय दलों और स्थानीय मुद्दों को हाशिये पर डाला जा सकता है।
- जटिल सुधार: इसके लिए बड़े संवैधानिक संशोधनों और चुनावी कानूनों में बदलाव की आवश्यकता होगी।
- संघवाद और राज्य स्वायत्तता: कार्यकाल का समन्वय राज्यों की संवैधानिक स्वायत्तता को प्रभावित कर सकता है।
आगे की राह
- सभी तीन स्तरों की सरकारों के लिए समन्वित चुनाव शासन व्यवस्था को बेहतर बनाएँगे। इससे पारदर्शिता, समावेशिता, सरलता एवं मतदाताओं का विश्वास बढ़ेगा।
- कानून आयोग संभवतः वर्ष 2029 से लोकसभा, राज्य विधानसभाओं और स्थानीय निकायों (नगरपालिकाएँ और पंचायतें) के लिए समकालिक चुनाव कराने की सिफारिश करेगा।
स्रोत: AIR
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संक्षिप्त समाचार 19-05-2026
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